Wednesday, 3 July 2013

इतिहास-कथा

समय लिखता
अपनी इतिहास-कथा
अतीत की स्याही से
वर्तमान के कागज पर
भविष्य की लेखनी से..

समय लिखता
अपनी इतिहास-कथा
कोई पढ़े या न पढ़े
कोई पढ़कर गुने या न गुने
लिखे गए का उद्घोष
कोई सुने या न सुने
या फिर सुनकर समझे या न समझे
उसकी अन्तर-व्यथा...

समय लिखता अपनी इतिहास-कथा
लिखना ही उसका कर्म है
लिख-लिख कर तटस्थ भाव से जीवन-महासमुद्र की लहरों में फेंक
आगे बढ़ते जाना ही उसका कर्म है
वर्तमान को सहेजते चलना
उसकी जीवन-अभिव्यक्ति का मर्म है।
लिखकर वह रिक्त नहीं होता
लिखकर थकता भी नहीं
लिखकर वह और नये भाव-बोध लिए
नित नए रूपों में प्राणवन्त बनता
अहर्निश चलता है इसी तरह
निरन्तर समायोजित करता अपने आगे के पड़ाव, अस्तित्व-यात्रा
लिखता जाता सदा
नवयुग-इतिहास-कथा।

कलकत्ता
14 मई, 1992




Time's Own History
Time itself writes its own history
with the ink of past
on the paper of present time
with the pen of future...

Time itself writes its own history
it does't care whether one reads it
or not, learns some thing from its
story are not, listens to its warning
or not, understands its inner
anguish or not, it goes on writing on and on...

Writing is time's hard task
and after it's done once & again
time throws it in the stream of life's ocean
then time continues its pace forward...

Time puts present in its order because
that is the secret of its living expression
Time is not emptied by writing
nor does it get tired
rather time's jottings of its new experiences make it vital
to go on and on, day and night, constantly without stop
time crosses continuously the new stoppages
on the journey of existence writing forever
the history of new ages and eras..

Calcutta 
14th May, 1992





प्रवंचना के बीच
प्रवंचना के काले बादलों के बीच
घिरते हुए मैंने अनुभव किया
जितना कुछ जीवन का यथार्थ
शब्द-अर्थ, आयाम, मनुष्य, प्रकृति-चित्रण को
मैंने अपनी अभिव्यक्ति का साध्य बनाया
वे सभी तो समय की प्रत्यंचा से छूट कर धराशायी होते रहे

फिर कैसे किन कठिन यंत्रणाओं के बीच
मैंने यह जीवन जिया

प्रवंचना के कुहासे के बीच
सिर्फ यही किया
कि अपनापन उन्हें दिया
जिनके पास शब्दों की बैसाखियां थीं
और उनको भी
जिन्होंने अपने से अधिक दूसरों को जिया।

गुवाहाटी (असम)
15 जनवरी, 2000




Deceit and fraud..
Surrounded by dark clouds of deciept and frauds
Whatever reality of life experienced
Words, meanings, feelings, dimensions, humans
natural emotions- I made them all
the aim and objective of
my self-expression
But they also then fell out of targets
shot up from the bow-string of time
How then I lived again admist the hard times
through the mist of wily surroundings

I provided kings human-ship to those
who only hold or move on crutches of words
and to the ones who lived more
for others sake
than for themselves alone
for new life to make.

Guwahati (Assam)
15th Jan., 2000



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