Tuesday, 27 November 2012

हंसी को विषाक्त बनने मत दो

हंसता हूं तो जैसे लगता है जग सारा हंसता है
रोता हूं तो अकेलापन डसता है
क्या देखता नहीं कि
बूढ़ी पृथ्वी मौसम परिवर्तन में
खुशियां मनाती है
फिर वह मेरे दुःख भरे आंसुओं से
संवेदित नहीं होती
क्योंकि उसके पास ऐसे ही
इतिहास-हन्ता दुःख हैं जो बनाते उसे उदास उन्मन
जिनसे जर्जर हो उठा है उसका अन्तर्मन

तुम मना लो उल्लास
अथवा रो लो, चाहे जितना, जिस तरह से
विखरा हो तुम्हारा मन- विन्यास
धरती अपनी पीड़ा से आहत
सागर तट पर शंख, सीपियां, मोती, मूंगे विनती है
 संसृति की वेदना से मुक्त नहीं हो पाती
अब वह अपने बचे हुए दिन गिनती है।

हंसना जीवन का सुमधुर क्षण है
रोना निःकृष्टतम अपकर्म है
अपने को जन-जन से जोड़ना ही मानवधर्म है
अन्यथा समय का अजगर
हमारी हंसी को डसता है।

                                    स्वदेश भारती
                                    05.06.12










सूर्य पर काला धब्बा

सौर जगत की अद्भूत घटना
शुक्र के बीच सिमटना
कितने सारे मिथ में बंटना
देव, दनुज, धरती, जन-जन का
विस्मय, भय के बीच सिमटना
अद्भूत खेल ग्रहों हाय रब्बा
सूर्य पिंड पर काला धब्बा


                                   स्वदेश भारती
                                    06.06.12






मनुष्य की स्थिति

जब ईश्वर ने मनुष्य बनाया
तो पहले मछली और अजगर का स्वरूप दिया
उसे यह शक्ल पसन्द नहीं आई
तब उसने मनुष्य को गिरगिट बनाया
लेकिन यह भी पसन्द नहीं आया
तो उसने प्रकृति, जीव-जन्तु, पंछी के रंग ढंग का ओज चढ़ाया
हृदय में प्रेम की अनुभूति भर दी
जो आज भी मनुष्य के उत्थान और पतन का
सबसे बड़ा कारण है
मानव मन के इर्द-गिर्द प्रेम का आवरण है
जो उसे आन्दोलित करता है
जिसके लिए मनुष्य मृग की तरह
कस्तूरी की खोज में भागता है
और समय की झाड़ियों में फंसकर अस्तित्वविहीन  हो जाता है
आखिर ईश्वर को मनुष्य के निर्माण का करिश्मा
कैसे भला रास आया
प्रेम और लोभ के इर्द-गिर्द उसे जीवन पर्यंत भटकाया।


                                                    स्वदेश भारती
                                                    07.06.12






सूर्य को शुक्र ग्रहण

ग्रहों को भी भुगतना पड़ता है दंड
वह दंड संसृति का निर्माण करता है और ध्वस्त भी
उन्हीं के प्रभाव में रहते हैं अस्तित्व-रक्षित
सचराचक, जड़-चेतन और ब्रह्नाण्ड भी
चंद्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण, शुक्र ग्रहण
 ऐसे ही महाअंतरिक्ष में कितने सारे ग्रहण
कितनी सारी खगोलीय घटनाएं
पृथ्वी को प्रभावित करती हैं
ये घटनाएं धरती के वातावरण को
ऊर्जा से भरती हैं अथवा खाली करती हैं

एक सौ पांच वर्ष बाद फिर देखने को मिलेगा
सूर्य-शुक्र ग्रहण का अद्भूत संयोग
किन्तु तब हम न होंगे, होंगे नए लोग
नए लोग होंगे, नई संस्कृतियां, नए-नए योगायोग
धरती पर तब क्या गुल खिलेगा?

दुनिया आश्चर्यचकित है शुक्र का सूर्य पर
अपनी काला छाया प्रत्यावर्तित करना
ग्रहों, नक्षत्रों का अपनी दबंगई सिद्घ करना
महाशून्य का यह दृश्य कितना आश्चर्यजनक है
जिसका असर अंतरिक्ष से धरती तक है
हम हो नहीं सकते निःसंग-एक सबक है।


                                                         स्वदेश भारती
                                                          08.06.12










यह पृथ्वी

यह पृथ्वी सालोंसाल इतनी सारी वर्षा का पानी पी जाती है
फिर भी तृप्त नहीं होती उसकी पिपासा
गढ़ती रहती सूखेपन की परिभाषा
गांवों, खेतों में धरती मागती है जल
बिना जल न फूल होते, न हरियाली, न फल
जब पृथ्वी जलमग्न होती है
पल दो पर में पी जाती सारा जल
यद्यपि कि इतने बड़े महासागर
उसके वक्ष पल में लहराते हैं
पर्वत नदियों के रूप में अपनी व्यथा अभिव्यक्त करते हैं
सब कुछ ग्रहण कर लेती पृथ्वी
महासागर, नदियों, वर्षा का जल
मनुष्य की अस्थियां
अपने भीतर कर लेती समाहित
बड़े-बड़े राजा, महाराजा, शूरमा
विशाल भव्य राजप्रासाद ऐश्वर्यवान साम्राज्य
इतिहास का भगनावशेष छुपा लेती अन्तराल में
यह पृथ्वी अनन्त काल से
मनुष्य-अस्तित्व का आधार बनती
वनश्री, फूलों, फलों से सजाती अपना अंग प्रत्यंग
कृष्ण के लिए रचाती रास, सीता-राम के लिए वनवास
कितनी सारी सत्ता-महत्वाकांक्षाओं की युगदृष्टा बनी
अपने भीतर सब कुछ समाहित कर लेती
यह पृथ्वी...।


                                                         स्वदेश भारती
                                                          09.06.12







सुब कुछ होता विनार्थ

पशुत्व होता है, प्रत्येक पुरुष में
और नारी अंक-शायिनी होती
मनुष्य की प्रभु-सत्ता में वह अपना अस्तित्व खोती
यूं चलता रहता जड़चेतन में
प्रेम-अप्रेम, निर्माण-विध्वंस,
चुम्बन और वैराग्य का चक्र
समय बली होती
समुद्र के अन्तराल से लहरें उठा लाती मोती शंख-पीपियां अनेकों रत्न
और छोड़ जाती तट पर निःस्वार्थ
कोई शब्द-चालीसा भी बनाए
तो संसृति के खेल का कैसे कर भावार्थ
ब्रह्मलोक से, नक्षत्रों से कौन कहे
सब कुछ अनन्तः हो जाता विनार्थ
सब कुछ चला जाता हमारी मुट्ठियों से झरझर रेत कण सा
चाहे नर-नारी हो अथवा देवता
कोई नहीं रहता अपने स्वरूप में अद्यतन
भले ही प्राण-संवेदना की देयता
असंख्य शब्द और उनकी अर्थवत्ता


                                                          स्वदेश भारती
                                                          11.06.12








अश्लीलता जीवन का आदि और अंत

मनुष्य का जन्म-अश्लीलता की चरम पराकाष्ठा है
किन्तु मनुष्य ही
अश्लीलता से परहेज करता है
अश्लीलता शोषण का मनोरंजक खेल है
जिसका विधि विधान रचता है कोई सृष्टिकर्ता
अश्लीलता से सत्-संस्कृति का क्या मेल है?
किन्तु चलता है अश्लीलता का अनिष्ट नाटक
चौबीसों प्रहर, घर-बाहर
होटलों, बारों, नाच घरों, विवाह-समारोहों में
आदमी की कामना मनचाही तृप्ति का आवरण पहन
अश्लीलता से निकलकर अश्लीलता पर समाप्त होती है
शब्द, गान, छन्द उसके इर्द-गिर्द नाचते हैं
सुखमय, सुमधुर जीवन मानव की आश्था है
उसी के इर्द-गिर्द हम सभी भागते रहे
कितनी सारी पीड़ा के घाव सहे
अश्लीलता और मनुष्य का जीवन पर्यंत अटूट नाता है
कोई कहे या न कहे
अश्लीलता ही जीवन का आदि है और अंत



                                                          स्वदेश भारती
                                                          12.06.12





सौंदर्य की सत्ता

स्वर्ग से धरा-लोक तक
सौन्दर्य जीवन का अपरिमित साध्यहै
मानव-मन सौन्दर्य के विविध रूपों को
अपने भीतर बाहर मानने को वाध्य है
क्योंकि सौन्दर्य से ही अनन्त लीलामय बनता आत्मबोध
सौंदर्य ही जीवन का आकर्षण है
जो कभी भी विद्रुपता, कटुता और अपरूप चिन्तन का
सहज अथवा असहज सह सकता है कोई अनरोध
सौन्दर्यही हृदय का श्रेष्ठतम आराध्य है
सौंदर्य की सत्ता कण-कण में व्याप्त है
देव, ऋषि-मुनि गण, मनुष्य को आत्मा के सौन्दर्य की निष्ठा
और उसके विविध स्वरूप की महत्ता का स्वाद प्राप्त है
सौन्दर्य की महत्ता छाई रहेगी अनन्त काल तक
स्वर्ग से धरा लोक तक






                                                          स्वदेश भारती
                                                          13.06.12











झरी अमराई की व्यथा-कथा

आम बागान के सारे फल झड़ गए
कुछ लोगों ने तोड़े, कुछ आंधी में गिरे
कुछ कोमल, तोते, काग ने खाए
और अब आम की डालियां
जो आम के गुच्छों से सजी थी
फलमुक्त होकर मना रही एकाकी मौन
कोयल बार-बार आम्रकुंज की डाल पर बैठ
पूर्ववत् गान गाती है कू-कू-कू
किन्तु उसकी आवाज में आम केन होे का सच
उभर कर वनश्री को उदास बना रहा है
गांव की झोपड़ी से बूढ़ी अपनी चोटी बच्ची के साथ
आम बिनने आती थी, अब निराश, भूखी
आम के बाग में फिर से बौर आने की आशा लिए
बच्ची को गीत गाकर सुलाती है -
अबकी बेरिया बगियन में लगेंगे बौर
आम खाइन तोहरे साथ रे सुगनिया।


                                                          स्वदेश भारती
                                                          14.06.12





उड़ता हुआ आकाश में

उड़ता हुआ आकाश में
फिर धरती पर आकर
अपने कर्म की दिनचर्याओं से जुड़ जाता हूं

जुड़ना ही जीवन की सार्थक प्रक्रिया है
वही मधुरतम सत्य है और तोड़ना अपने को दूसरों से
टूटना अंधकारमय होता है
ऐसी स्थिति में मैं उस रास्ते को छोड़ता हूं
जिस पर टूट की विडम्बनाएं होती
और दूसरे पथ से जुड़ जाता हूं

रास्ते अनेकों हैं- कोई साफ सुथरा है
तो कोई कंटकाकीर्ण, कष्ट कारक, उबाऊं
घुमावदार, निर्जन, ऊबड़-खाबड़, सघन जंगल
उपात्यिकाओं घाटियों, पर्वतों से होकर
समय-महासागर के विस्तृत रेतीली तट पर
चलते जाना है
पता नहीं फिर कब लौटना है
इसीलिए आत्मछातक स्थितियों में
आत्म -अनात्म से जुड़ जाता है
आशा, विश्वास भरे मन मस्तिष्क सोच से
असाध्य पथ पर मुड़ जाता हूं।


                                                          स्वदेश भारती
                                                          15.06.12

























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