Monday, 26 November 2012

हाय रे औरत तेरी प्रवंचना

औरत एक खौलता हुआ दरिया है
जिसमें प्रत्येक पुरुष को बहना है
औरत-मानसिकता से उद्वेलित लहरों के
आलोड़न को सहना है

औरत मां है, बहन है, बेटी है
और पत्नी है, रखैल है
दुनिया में पुरुष-कामना की सहचरी है
जो करुणा, क्रोध, दया, क्षमा से भरी है
कितने सारे युद्ध औरत के कारण हुए
द्रोपदी न होती तो महाभारत भी नहीं होता
आर्यावतर् महान शूरवीरों को नहीं खोता
सीता भी राम-रावण युद्ध का कारण बनी

औरत की प्रवंचना, छलना से इतिहास के 
कितने सारे पृष्ठ भरे पड़े हैं
और मर्द तो भूखा कुत्ता की तरह
रोटी की तरह, नारी देह से अपनी भूख मिटाता है
मातृ देवो भव का आदर्श किसे सुहाता है?
इस आधुनिक युग में
जब जीवन और संस्कृतियां
तेजी के साथ बदल रही है
चरित्र में नवोन्माद भरता जा रहा है
इस युग का अन्त, संस्कृतियों का क्षय,
औरत के कारण ही होगा।

                                                       स्वदेश भारती
                                                       01. 06.12






अकेला विहग

जंगल का अकेला विहग
क्षितिज में उन्मुक्त उड़ते, दाएं बाएं मुड़ते
नए-नए क्षितिजों से जुड़ते
किसी आश्रय-वृक्ष की सघन छाया में
अपना नीड़ बनाएगा?
एक नीड़ छोड़कर दूसरा अपनाएगा
वह तो नितान्त अकेला है
कोई नहीं है उसके संग
जंगल का विहग...

वह उड़ता जाता है अनन्त आकाश में मनचाही दिशाओं में चक्कर लगाता 
अकेले ही अनमने मन मौनबद्ध गीत गाता
अकेले गीत गाने का भी बड़ा मौजूद होता है
जिस झलकता है अन्तर मन का रंग
जब अपना बसा बसाया नीड़ छोड़कर उड़ता है
उस पंछी के बहुत से हैं प्रसंग
अतीत को छोड़ता भविष्य की तलाश करता
क्षितिज के आरपार चक्कर लगाता
जंगल का अकेला विहग

                                                       स्वदेश भारती
                                                       02. 06.12








हारिल

तुमने कहां से सीखा है सुमधुर-तान-गान
शायद उन पर्वतों से
जिनपर बर्फ से टकराकर सबेरे की सोनाली किरणों
अपनी स्वर्ण आभा बर्षाती है
सीखा है तुम ने
उन घाटियों, उपत्यिकाओं से
उन झरझर झरते झरनों से, सागर और
नदियों के कलकल से, लहरों के उद्वेलन से
कहां सीखा है गान की मधुर तान

तुम्हारे सुमधुर गान सुनकर सोई हुई
हृदय-वेदना जाग उठती है
मस्तिष्क में स्वप्निल सपनों का ज दुअई संसार
जागृत हो उठता है।
कितना आकर्षण है
कितना मनको मयूर की तरह नचाने वाला है
तुम्हारा स्वर-ताल-गान
जिसे सुनकर बेसुध हो जाता है हृदयमन-प्राण

                                                             स्वदेश भारती
                                                            04. 06.12







2 comments:

  1. बहुत उम्दा कवितायें | कृपया टिप्पणी करने में " Word Verification" हटा दें |

    आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (28-11-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  2. बहुत सुन्दर कवितायें।

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