Wednesday, 21 November 2012

आहत-प्रेम के रूप

जबसे मेरे चिन्तन की मौन-धारा में तुम समाई 
हृदय की शांत संवेदना की लहरें उद्दवेलित हो गईं
आत्म विभोर तो हुआ मन उल्लसित, आनंदित
किन्तु धारा का बहाव प्रबल हो उठा
चारों ओर तीव्र ध्वनि छाई
बजने लगी प्राण में प्रतीति की शहनाई
जब से तुम जीवन में आई....

प्रेम-आत्म विभोरता के सामने शहंशाहियत का
ठाठ-बाट, ऐश्वर्य-वैभव कुछ भी नहीं 
हृदय हो जाता नशेमान, विह्वल
जब चढ़ता है रंग प्रेम का 
किन्तु जरा सी असावधानी संगत मनुहार में
जब गिरते हैं अश्रुजल, हृदय पत्रों पर
तैरता है मन बेकल विकल आत्म पीड़ा-मझधार में
पता नहीं कहां से कैसे प्रेम-संवेदना ने की सगाई
जबसे द्रवित मन में तुम आई..

प्रेम निष्ठुर नहीं होता, नाही कोई मांग करता
वह अपना संसार स्वयं रचता
उसे प्रभामय बनाता, करता सर्वस्व आत्म समर्पण
किन्तु अविश्वास और प्रवंचना से आहत
प्रेम बन जाता टूटा हुआ दर्पण
ऐसे में अविराम होती है जग-हंसाई....

                                       स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 11.05.12


कितने सारे पैमाने जीवन के

कितने सारे पैंमाने जीवन के
कितने सारे आत्मदाही क्षण
आनन्दोत्सव मनाते, करते चिन्तन-मंथन
कौन हर लेता पीड़ा-कसक जन-जन की
बनाए घरौंदे आकांक्षा के और हर तरह से सजाए
हमने कितने सारे स्वप्न-आकांक्षा सेतु बनाए
जीवन को सजाने के लिए कितने सारे उपादान संजोए-
घने जंगलों, पर्वतों, नदी, सागर-तट पर
बहु आयामी स्वप्न-रेत को मुट्ठियों में भर लिए 
आगाध, अनन्त का स्मरण कर
अंतर-विषाद का किए तर्पण
किन्तु जो कुछ बचा मुट्ठियों में
वो स्वप्न-रेत नहीं थी
मुट्ठियां खाली थी
फिर यह सीख लिए-
आत्माहत होकर जीवन जीना
कितना कठिन, कितना औदार्य-हीन होता है
इसी क्रम में मनुष्य अपनी अस्मिता के आयाम खोता है
और स्वप्नाकांक्षाओं का होता विसर्जन
जीना है तो स्वीकारना होगा 
सभी तरह के खट्टे मीठे क्षण

                                       
                                      स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 12.05.12




अस्वस्थ शरीर

अस्वस्थयता शरीर को पंगु बना देती है 
मन में एक विषाद भर जाता है
जब हाथ पांव काम नहीं करते
और आंतों में भर जाता है अपरूप धुंआ 
जीवन का आनन्द घायल हारिल पंछी तरह उड़ नहीं पाता
जब सूखने लगता है रुग्ण-सूखा तन


                                        स्वदेश भारती
                                        कोलकाता - 13.05.12





जीने की कशिश

मैंने सभी अर्थों को जानने का यत्न किया 
शब्द और अर्थ को पहचान कर यह जीवन जिया
किन्तु सम्बन्धों के विविध संदर्भों के बीच
मनुष्य के भीतर छिपे सत्य-असत्य के अर्थ को
जीवन पर्यन्त समझने की कशिश से
दूर होता गया
क्योंकि संबंधों का चोला बदलता रहा नया नया
कभी अपनी अंतर-पीड़ा अभिव्यत किया
कभी पुराने फटे-कटे संबंधों को सी लिया
उसे भी जिया अनपेक्षित , अनचाहा
बस जितना जिया प्रारब्ध बन गया।


                                       स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 14.05.12



स्वतंत्रता-परतंत्रता

देखो न! कैसी कैसी लड़ाई हो रही है
अन्याय के विरुद्ध नहीं, भ्रष्टाचार के विरुद्ध नहीं
बलात्कार, अत्याचार के विरुद्ध नहीं
गरीबी, बेकारी, बीमारी, भूख और संत्रास के विरुद्ध नहीं
लोग भाग रहे संसद से सड़क तक
सत्ता के लिए लड़ाई लड़ रहे, झंडों के पीछे भाग रहे
साधुओं संतों से लोहा ले रहे, 
प्रगति के रास्ते अवरुद्ध कर रहे
आजादी में हर आदमी आजाद है
उसकी आत्म-लिप्सा उसका सरताज है
जीवन जीने की सार्वजनिक नीलामी हो रही है
भ्रष्ठ जीवन यापन से कहां किसे कितनी लाज है।


                                       स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 15.05.12




अक्षरज्ञान का अधूरापन

अक्षरज्ञानी, विज्ञानी, उपदेशक, मार्गदर्शक
अपने को पूरी तरह अभिव्यक्त   नहीं कर पाता
यही एक कारण है 
जो उसकी मन-बुद्धि को सताता
जीवनपर्यन्त, जितना भी चाहे जिए, मरे,
चेष्टाएं करे, जितना भी ज्ञान-रस
जीवन के रिक्त-कलश में भरे
किन्तु वह आधा-अधूरा ही होता है
वही फसल काटता है, जो बोता है।

जीवन एक पहेली है
जो पूरी तरह समझता है
वही समय-प्रवाह में तैरता है
जो आधी समझ से
पूरा का पूरा जीवन जीता है
वह किनारे पर बैठा उस प्रवाह को देखता है
जिसमें हर आदमी बह रहा होता है

अक्षर-शिल्पी तुम्ही बताओ
क्या अपने को या समय को पूरा का पूरा अभिव्यक्त कर पाओगे
निरुत्तर होने के अतिरिक्त भला कहां जाओगे
जो प्रारब्ध में है ही नहीं
वह मिल नहीं पाता
बस यही रिक्तता जीवन के सभी अर्थ-
विनार्थ का अपरुप छन्द बन जाता
जो पल-दर-पल मन बुद्धि को सताता।


                                      स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 16.05.12




आदमी का मरण-जीवन

आदमी रोज मरता है
रोज जीता है
नए-नए परिवेश में
नई-नई आकांक्षा विश्वास के साथ
नए-नए कारनामों से
रिक्त मन-कलश भरता है
आदमी रोज मरता है

आदमी फिर-फिर से जी उठता है
इस मरने और जीने में
आग जो सुलगती है सीने में
एक अहसास ही तेरा नाम जिन्दगी है
कि हम होंगे कामयाब
कभी न कभी, किसी न किसी दिन
खोज लेंगे अस्तित्व का मार्ग नायाब
मनुष्य के पसीने से जो श्वेदकण टपकता है
वही खालीपन को भरता है
आदमी कभी अपनों के विश्वासघात से
कभी सपनों के टूट जाने के आघात से
प्रतिदिन मरता है
किन्तु संसार का नियम है कि वह जीए
मरण-पर्यन्त नई आशाएं लिए
इस सबके बावजूद स्वतः समय के हाथों 
आदमी अपनी मौत मरता है
एक करुण स्वर गूंजता है हर समय अतःस्य अनस्वर
आदमी अपने को पूरी तरह खोलने से डरता है।


                                      स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 17.05.12






केवल जीने के लिए

केवल एक बात के लिए
इतनी सारी दिनचर्चाएं-थकी, हारी, असमर्थ
खोजती जीने का अर्थ
केवल इस बात के लिए
कि कैसे अर्थ का संकट जाए
सुख, हंसी, आनन्द आए
बस इतनी सी बात
और सारा जीवन सहते
विपरीत परिस्थितियों का निर्मम आघात
भागते रहते अस्तित्व की काली सड़क पर
जागते, सोते, कभी मौन के अवगुंठन में बंधे
कभी चीखते, चिल्लाते करुणा-स्वर,
जीने के क्रम में झेलते जाते सब कुछ
प्रिय, अप्रिय, मान-अपमान
भय की सुई से होंठ सिए
बस जीने के लिए....


                                      स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 18.05.12






लिच्छवि का आहत मन

लिच्छवि के घर आंगन में
मिथिलेश कुमारी खेलती, भागती, छुपती, हंसती
वन-प्रांन्तर में सखियों के साथ घूमती
विविध क्रीडाएं करती बड़ी हुई
राम के गले में जयमाल डालती हुई
प्रसन्नता से अधीर हुई जानकी
ठहर गई हवा, धरती उत्फुल्लित हुई
जन-जन, वन-वन आनन्दातिरेक से भर गया
फिर 14 वर्षों के वनवास का समाचार
और जब उनका हरण हुआ
मिथिला के नर-नारियों के रुदन से धरती का दम घुट गया
जैसे सब कुछ उनका लुट गया
करते हुए प्रार्थना घरों से निकल आए नर-नारी
भूल गए व्यापारिक चातुरी बनिया, व्यापारी 

फिर जब राम रावण युद्ध में राम विजयी हुए
मिथिला आनन्दोल्लास से हर्षित हो उठा
जन-जन, वन-प्रांतर में होने लगे उत्सव
नाच, गान, एक स्वर एक प्राण, एक तान

फिर जब सीता को अयोध्या के बाहर
बीहड़ जंगलों में भेज दिया गया
लिच्छवी का करुणा-रुदन
मिथिला के चारो ओर गूंजने लगा
विक्षोभ भरा दुःख भर गया जनजन में
सिया के मन में


                                      स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 19.05.12





दर्द टीसता है भीतर

दर्द केवल टीसता नहीं भीतर ही भीतर
बल्कि आंखों से चलकर, हृदय और
मस्तिष्क को तोड़ता मरोड़ता
अंग अंग में अपने अहसास का बीज
बोता है
यही दर्द में होता है


                                      स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 21.05.12





जीवन की सत्य परता
जितना कुछ जीवन का अवशेष बचता है
उतना ही उसे प्यार का संकट डंसता है
कठिनाइयों में भी
यूं तो सही माने में
बाहर से भरा भरा
किन्तु भीतर से रोता हूं


                                      स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 22.05.12





स्वयं सिद्ध-पथगामी

जैसे जैसे दिल में असमय की कालिख
लगती रही, मैं संतापग्रसित अपनी
जीवन-यात्रा में चलते-चलते थकान का अहसास,
और प्रवंचना के संताप का दुख सहता रहा
मैं ठीक हूं, स्वस्थ हूं, दुरुस्त हूं कहता रहा

जैसे-जैसे समय का पहिया आगे बढ़ता रहा
मैं अपनी असमर्थता-बोध का संत्रास झेलता रहा
प्रभात में नए आलोक से नई-नई शपथें लिया
अंधकार में रास्ता भटक गया और पुनः शपथ लिया
अब मैं अंधेरे के बीच भीच लूंगा
प्रवंचित इतिहास की छाया से दूर
नए विश्वास, नई आशाओं से भरपूर
अपने गन्तव्य-पथ पर चलता हुआ

समय का क्या, कभी भी असमय में बदल जाता है
फिर जब नई खुशियां, नई उमंगें, नई आशाएं,
नव-अस्तित्व का प्रदीप जलाती है
कर्म की बाती और चेतना के तेल से ही
हृदय-प्रदीप जल पाता है। इतिहास यही मानता है,
मैं इतिहास के खंडहरों में इधर से उधर
वर्तमान के कुहासे के बीच
नव-संस्कार खोजता घूम रहा
और शब्दों के जंगल में भटकता हुआ
अपने पथ पर चलता रहा।


                                      स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 23.05.12





मनुष्य की जीने की कशिश

जब प्राकृतिक छठा भाती नहीं
जब हृदय में प्रेम की नई पीड़ा आती नहीं
तब आदमी कठोर बनता जाता है
अपने भीतर, बाहर क्षुब्ध विचारों को जन्म देता
जन्म लेने, कर्मक्षेत्र में युद्ध करने 
और जीवन-यात्रा को जब 
गन्तव्य तक ले जाने की कशिश भी सताती नहीं
तब वह मृत प्राय कहा जा सकता है।
आदमी का जीना
उसकी आदमियत के दर्प पर निर्भर करता
अन्यथा वह बेमौत मरता।


                                      स्वदेश भारती
                                       कोलकाता - 24.05.12














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