Thursday, 13 March 2014

जीवन अस्तित्व

कितना कुछ घटित होता जीवन में
कितना कुछ
कितना कुछ खोता जाता आदमी
कितना कुछ
और जो कुछ वह पाता है
उसे भी तो खोता चला जाता है
समय इसी तरह गुजर जाता
बहेलिए की आखेटघाती तीर की गति जैसा
समय, कभी ठहरता नहीं लक्ष्य-तक पहुंचने से पहले...

समय किसी सिंहासन के आदेश पर सिर नहीं झुकाता
समय, असमय होता किसी के भी जीवन में
जो धुन्ध की तरह छा जाता
फिर क्षणों में आंखों से ओझल हो जाता
संचित प्रेम-सुख के छिन जाने पर
समय प्रभात-ओसकण बनकर
अपनी करुणा बरसाता...
अतृप्त प्यास, सुख, दुःख का
अहसास लिए
समय सदा ही वर्तमान को खोता

अतीत को पीठ पर लादे हमेशा क्या कोई चल पाता?
भविष्य की आशाएं ढोता
आदमी कितना कुछ खोता...

आशाओं के छिन्न-भिन्न होने पर
किंकर्तव्यविमूढ़ आंखें भिगोता, पछताता
विस्मृतियों के जंगल में चक्कर लगता....

सचमुच आदमी इतिहास के टूटे हुए आइने में
स्मृतियों की खंडित छाया के अतिरिक्त
भला क्या देख पाता है!



Existence of Life
How so often happens in life
How so much is lost
One plays the game of gains and losses
in the course of life and the time moves on
Does it ever slacken its speed?
Like a hunter's arrow
Does it ever stop
before reaching the target?
Time never bows its head before these ones
As misfortune or distress erupts all life
Like a dense fog the mystic moments
Do pass after some time...

When stored up joys of love are fobbed off
Time's touching tenderness rains
like the dawn's dew drops fall on petals
The unquenched thirst
with experiences of joys and sorrows,
Time always loses the present.
Is it possible for any one to go on and on

With the load
of past events forever..?
How so much is lost in life
when one's fancies and fantasies are shattered
The eyes shed tears and wink much

Man wanders alone in forests of forgetfulness
Truly, he observes what else except
the distored images of memories in
the broken mirror of lifes past....!

2 comments:

  1. बहुत सुंदर. होली की मंगलकामनाएँ !
    नई पोस्ट : होली : अतीत से वर्तमान तक

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 15/03/2014 को "हिम-दीप":चर्चा मंच:चर्चा अंक:1552 पर.

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