Thursday, 7 March 2013

समय-मौसम-बेमौसम

तुम्हें कैसे समझाऊं
कि जब मैंने समय की प्रतीक्षा की
तो वह दबे पांव गुजर गया
आहिस्ता आहिस्ता
ठीक मेरी आंखों के सामने

और फिर जब
भयाक्रांत अस्तित्व की सुरक्षा में लगा था
तो वह तेजी के साथ गुजर गया
ठीक मेरी पीठ पीछे
और तब मैंने गहरे मन से अतीत को याद किया
कि यह जीवन यूं ही जिया
पर तब मेरा समय
अपनी लघुता में खो गए

जब मैंने प्रतीक्षा के बन्धन
निर्ममता से तोड़ दिया
छोड़ दिए बनाना असित्तव के सुरक्षा-सेतु
तब समय बहुत बड़ा हो गए
और मैं लघुतम..

आखिर तुम्हें कैसे समझाऊं
समय, प्रेम और सपने से
कितना बलवान होता है

कलकत्ता
27 जुलाई, 1975






Time-In Season and out of season

How to explain it to you
that when I waited for time
It passed stealthily away with silent steps
slowly and slowly before my eyes

And when I was busy in
protecting my fear-striken life
the time passed away hurriedly
just behind my back

And then I remembered deeply
my past and thought of my life
that I lived purposelessly...
then my time was lost in its insignificant trivial.
I snapped it cruelly

The bondage of waiting
self building dams for protecting life
then time turned into a tide

How to explain it to you
that time is at last stronger
than love and fantasy
howsoever absorbing it maybe!

Calcutta
27th July, 1975







समय-गति

समय चलता है
कभी तेज, कभी सरपट
कभी शिशु की
पग-बंध गति से
चलता है ठुमुक-ठुमुक कर
आगे बढ़ता
अपने इर्द गिर्द ओढ़े
ढेर सारा वर्तमान अंधेरा-उजाला
अपने ही इताहस में पलता है
समय चलता है।
कोई भी देख सके तो देखे
शिशु की प्रथम पग-गति में बंधा
जीवन
अतीत
वर्तमान
और भविष्य
सपने सजाने का बेहिसाब सिलसिला
और यह क्रम
क्षण प्रतिक्षण बदलता
समय चलता।
चलना ही समय है
और ठहरने शून्यता है, अंधेरापन है
मरण है
समय ही हमें सिखाता है
सृष्टि-कर्म के नए-नए अन्वेषण
और यह भी कि
मनुष्य जब भी अभिलाषाओं के सेतु
निर्माम करताहै
तो उसकी मह्तवाकांक्षा का आधार
समय के बीच ही ढलता है
समय अहर्निश अबाध गति चलता है
और हम उसके बहुत पीछे
छूट जाते हैं।
आगे नहीं चल पाते
तो जीवन में अंधेरा लाते हैं।

पूना,
4 सितम्बर, 1992






Time's Course of Events

Time moves on and on..
nose-gallops
now and then with measured steps and sometimes
like a child gracefully walking in slow paces
But it ever goes on freely
surrounded by light and darkness
nurtured by its own past
time moves on and on..
who ever can visualise
must see that time is fastened
with the first steps of childhood
past life, present and future,
It sets dreams in order consecutively
and this chair changes every moment
time moves on and on imperceptibly...
moving is time, resting,
The isolation and death
time also teaces Nature's new settings
Novel attempts on discoverly
And also that when ever humans
build new bridges on wishes
and their base ambition is everse
moulded within Time's frame
Time moves day and night incessantly
and we lag far behind
can't move with it
And fill our life with ultimate darkness.

Pune,
4 Sept. 1992

No comments:

Post a Comment