Monday, 30 July 2012

टूटते तारे की व्यथा

टूटे तारे की अन्तर्व्यथा को कौन जाने
जो अपने केन्द्र से टूटकर
महाअंतरिक्ष के किसी नक्षत्र में समा जाता है
क्षणभर में कहां से कहां चला जाता है
किन्तु टूटे तारे का प्रकाश खोता नहीं
किसी दूसरे, तीसरे नक्षत्र के साथ
वह हृदय में प्रकाश लिए हाथ मिलाता है

टूटा तारा महाशून्य-पथ पर भागता चला जाता है
वह भी अपने समय से छला जाता है
किन्तु ग्रहों, उल्कावलियों की बाहों में बाहें डाले
उन्मत्त नाचता है, हुड़दंग मचाता है
जलते हुए हृदय की तपिस में आत्मदग्ध
अपने अस्तित्व को हर तरह से बचाता है
अन्तरिक्ष में विलीन हो जाता है।


कर्म का खेल
परती धरती की तरह दुःख
नए-नए मौसम में अपने को सजाते हैं
कभी त्रयोगुणी वर्षा की प्रतीक्षा में दिन काटता
कभी विसंगतियों की आग में झुलसता है
आधा जीता, आधा मरता है।
हम जो, जैसा चाहते हैं, वैसा होता नहीं
जो होता है उसे चाहते नहीं
जीवन की इस आपाधापी में
मिट्टी में दबे बीज की तरह अंकुर बन फूटता हूं
अपने को मौसम की हरियाली से जोड़ता हूं
आदमी जैसा जो करता है
वही, वैसा ही तो भरता है
उम्र-दर-उम्र प्रेम नवस्फूरण की चाह लिए
कितनी तरह से जोड़ता -तोड़ता है
हर किसी को नए मौसम की प्रतीक्षा रहती
आस्था ही विखराव का दर्द झेलती
भाग्य हमें मोहरा बनाकर स्वच्छन्द खेलती

कोलकाता
4.5.12

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