Wednesday, 4 July 2012

मन की माटी में

मन की माटी में
कभी उगाता धान
कभी गेहूं, बाजरा, मकई
तरह तरह के अनाज
साग सब्जियां, फल
पाषाण हृदय, वक्रबुद्धि के आघात से
सूख जाती फसल
किन्तु धूप, हवा और बादल
देते मुझे जीवन-दान
दिन प्रति दिन
किसी न किसी विन्दु पर
चाहता हूं प्रकृति का अवदान
क्योंकि वहीं तो
प्रत्येक स्थिति में
करती है संकट से परित्राण
ऊब और खीझ भरा दिन चर्याओं के बीच
आस्था परिवर्तन में
हंसी और क्रन्दन में
प्राप्य और अप्राप्य की बांटा बाटी में
हृदय के प्रस्फुरण में अंकुरित होता नवचिन्हत
मन की माटी में...

                   कोलकाता 16.4.12

जीने का अर्थ

जीने का अर्थ
सबेरे से शाम और रात के अंधकार कि समाप्ति तक
कितने सारे शब्द उभर कर रिक्त हो जाते हैं
निजता की खातिर हमारी अस्मिता
तरह तरह के स्वांग करती,
रंग-बदरंग खेल दिखाती
कितनी सारी दिशाओं में, सिवान और शहरों में
तरह-तरह से भागती, विजयी होने के लिए
शताब्दी की सन्निपातग्रस्त काली सड़क पर
भागते भागते हांफती, बैठ जाती, सुस्ताती
यह शब्दों की दुनिया का एक पहलू है
एक क्रीड़ा स्थल है, दंगल है, प्रतिस्पर्धा है
हमारा अस्तित्व, छल, बल, कौशल जैसा है
उसे स्वच्छन्द भाव से दिखाना सामर्थ्य है
वास्तविक जीने में, समय-मंच पर, जन जन को
अपने को स्पष्ट तय; दिखाने में क्यों पर्दा है?

जैसा दिखता हूं वैसा नहीं हूं
जैसा हूं नहीं परन्तु दिखता नहीं वैसा
कौन देखे पाता है
किसी के भीतर
जैसा देखता है वैसा दिखता नहीं
भले ही जीवन की बाजी हार जाएं
किन्तु एक हृदय-दर्प है जो बिकता नहीं
शब्दों की रंग-विरंगी चूनर पहन
अभिव्यक्ति की सुन्दरियों
कविता के कालजायी मंच पर
करतीं चेतना का प्रदर्शन
किन्तु वास्तव में
करतल ध्वनियों से भरा माहौल वैसा नहीं होता
जो नकली मुस्कान के साथ
मन्द, तेज चाल चलती
शब्द-सुन्दरियां दिखाती अपने रूप का जादू
उनके भीतर वैसा नहीं होता
मौसम की भार सहता
एक अकेले वृक्ष की अन्तर-सोच
और हमारे जीवन के संघर्षों से आहत मन की
दशा का स्वरूप जैसा दिखता है
वैसा नहीं होता
जो शब्दों का जाल बुनता हूं। आस्था की नहीं के बीच
रोज व रोज नव चिन्तन की
बड़ी छोड़ी मछलियां पकड़ने का यत्न करता हूं
वह श्रम अस्तित्व के बाजार में बिकता है
अन्ततः शब्द भी छूट जाते हैं
उनसे जब संबंध टूट जाते हैं
तब दोनों मुट्ठियों में भर जाती समय सिक्ता
जैसा जो है क्या वैसा दिखता।

चन्द्रिमा एक रोटी
महानगर के बीच झोपड़पट्टी पर
पूर्णमासी की चंद्रिमा अपनी प्रभा विखेर रही थी-
झोपड़ी के बाहर भूखा बच्चा रोटी बनने की प्रतीक्षा कर रहा था
उसने चांद को देखा, मां से कहा -
देखो मां आकाश में कितनी अच्छी
बेशन की रोटी अटकी है
उसे लाओ न मां, बड़ी भूख लगी है
मां ने आंसुओं को आंचल से पोंछते हुए
धीमें स्वर में कहा - बेटा, वह चांद मामा हैं
और रोटी अपने घर ले जा रहे हैं।

अंतहीन प्रतीक्षा

प्रतीक्षा का कभी अंत नहीं होता
एक प्रतीक्षा थी कि बड़ा होकर
सर्वश्रेष्ठ शिक्षा ग्रहण कर
अपने रहने लायक धन कमाऊंगा
और एक प्रतीक्षा थी
कि अपना घर बनाऊंगा, ओ सजाऊंगा
माता-पिता को हर तरह से सुख दूंगा।
एक और प्रतीक्षा थी
कि जीवन साथी को प्रेम के अतिरिक्त
वह सब दूंगा जिसके लिए
औरत प्रत्येक सुबह नए नए फरमान देती
यह चाहिए, वह चाहिए
हंसी और आंसू का कितना सारा खेल
कितनी बार देखा है
प्रतीक्षा करता रहा कि दिन अच्छे फिरेंगे
सुख संसाधन के जो फल
श्रम साध्य-वृक्षों की डालियों से कर गिरेंगे
उन्हें सबके साथ बांटकर खाऊंगा
किन्तु ऐसी तूफानी हवा आई
कि उसके निर्मम हाथों से फल ही नहीं
वृक्ष ही जड़-विच्छिन्न हो गए
प्रतीक्षा है कि फिर से पौधे बड़े हों
उनकी डालियों में फल लगे, पके
और नई सोच के वन्दे खाएं, सुख पाएं
यूं तो प्रतीक्षा का कोई अन्त नहीं होता
एक के बाद दूसरी, तीसरी, चौथी
और ऐसी कितनी ही प्रतीक्षाएं करता हूं
दुखिना-सुखिना की आलोछाया में
नए नए शब्दों से हृदय की खाली झोली भरता हूं।

                                                 कलकत्ता 
                                                 20.04.12




गर्मी से बचने के उपाय


घर बाहर भीतर गर्भ तापतपी हवा
अनाछूत घुस आती है
शरीर की नसों में बहते रक्त को उबाल लेती है
मन में बेचैनी बढ़ाती है
झंझावात की बाहों में बाहें डाले
गर्म हवा झौस जाती है
बाहर दोपहरी धू धू कर छोड़ रही विश्वास
सूख रहे बगिया के पेड़, बेला, चम्पा, पलाश
गर्मी की तपिस से क्या निस्तार है
फ्रिज हो या मिट्टी का घड़ा हो
ठंडा पानी पियो। फेरी वाले से
आइस्करीम लेकर खाओ। ठंडा पेय पिओ
बस इसी तरह पसीना पोंछते हुए जिओ

इसके अतिरिक्त भीषण गर्मी से बचने के लिए
क्या क्या कोशिशें होती हैं - दरवाजे,
खिड़कियां बन्द करो, गर्म हवा घुसने न पाए
पानी के छींटे फर्श पर, विस्तर पर मारो
पंखा चलाओ, बेना से काम लो
और कुछ न हो तो अखबार से करो हवा
गर्मी से बचने की बस यही है दवा

                                                 
                                                 कलकत्ता 
                                                 21.04.12




 आजादी की लड़ाई
देश में आजादी की दूसरी लड़ाई की तैयारी हो रही है 

झूठ-फरेब, आनियंत्रित भ्रष्टाचार के विरुद्ध
सिवान से लेकर नगर तक नव जागरण का बीज जनमानस बो रही है
जीर्म-शीर्ण कपड़ों में निर्धन बच्ची पोखर के किनारे
टूटे-फूटे बर्तन धो रही है
आजादी के ढूंढ पर बैठे कौवे पंचायत कर रहे हैं
भ्रष्ट मान सून से बचने के तरीके खोज रहे हैं
देश की तकदीर कालेधन के विस्तार पर बेपर्द
आराम से सो रही
नयनों में उमड़ता इतिहास का दर्द


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