Wednesday, 20 June 2012

प्रेम का अंत

प्रेम मन के भीतर पैदा होता है
मस्तिष्क को मथता है मन की की पीड़ा सहता
अंतर्द्वंद के कीचड़ में धंसता है
सूनी निश्वासें छोड़ता
अपने को गन्तव्य-पथ से मोड़ता
संत्रास, दुःख आंसू, विरह, आत्मग्लानि और
हृदय में नदी की सूखी धारा का सूखापन लिए
समय-बहेलिए के जाल में फंसता जाता।
जय-पराजय के बीच अपने को गौरवान्वित करता
पद दलित अथवा अस्तित्व खोता
प्रेम मन के भीतर
कितनी तरह के, कितने खेल खेलता
जीवन के नष्ट नीड़ को छोड़ना ही बुद्धिमानी है
प्रेम की बलिवेदी पर सब कुछ न्यौछावर करना बेमानी है।
प्रकृति और मनुष्य के भीतर बाहर प्रेम ही विकृतियां ढोता है
जीवन को आंसूओं से भिगोता है।

                         कोटिल्या (प्रतापगढ़) यूपी    6 अप्रैल, 2012


शहर एक सपना
 शहर सच का नहीं होता, सच से नहीं बनता
वह जानता है कि
किस तरह से भ्रष्ट, काले धन से भव्य भवन
पार्कों, गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण हुआ
किस तरह शताब्दियों से फुटपाथी भूखे सोते हैं
झोपड़पट्टियों में कड़ी मेहनत के बाद
निकलता है धुंआ
धनवानों, लक्ष्मीपतियों के लिए
शहर, होटलों, नाइट क्लबों, वार-पवों
काफी हाउसों, बार-वनिताओं से बनता।
कार्पोरेशन उसे हजार हजार दीप-लैम्पों
चमकती काली सड़कों,
फूल बागानों से सजाता है
फुटपाथों को सुन्दर बनाता है।
किन्तु फुटपाथियों के लिए कुछ भी नहीं करता
उनके नंगे भूखे बच्चे मांगते हैं भीख
और बड़े होकर बन जाते हत्यारे, आतंकवादी
पुलिस, थाना, लाठी, पानी की बौछार वाले पाइप-
आंसू गैस, गोलियां बन्दूकें अभावग्रस्त, दलित, भूखे,
असहाय, हारे हुए, आशा और विश्वास के
छिन्नभिन्न तारों को  जोड़कर
जीने वालों के विरुद्ध पुलिस मुस्तैद रहती है
प्रत्येक शहर में उल्टी गंगा बहती है।
शहर एक आनन्द गीत का टूटा छन्द होता
और एक टूटा हुआ सपना होता।

                                      कोटिल्या (प्रतापगढ़) यूपी     7 अप्रैल, 2012


लड़कियां आधाफूल,  आधा कांटे
लड़कियां कभी फूल बन जाती, कभी कांटे
वे सदा बंधना चाहती हैं कहीं न कहीं
मन के अनुसार बाजार संस्कृति की चमक से
उद्भ्रांत होती, बनाना चाहती रिश्तेनाते

लड़कियां अपनी पसन्द का बीज
दस-ग्यारह साल के बाद ही
रुप-अरुप मन की माटी में बो देती हैं
वह बीज 2-4 वर्षों में ही सघनवृक्ष बन जाता
फिर अनसोई गुजरती हैं उनकी रातें
और दिन का उजास अच्छा नहीं लगता
प्रेम के फूल खिलते हैं उस मन के वृक्ष में
विचारों के कोमल से कोमल और
सख्त से सख्त पैमाने बनाते...

लड़कियां गीली मिट्टी होती हैं
जिसे मनका मीत बनाता सुन्दर पात्र
और लड़कियां टूट जाती असमय की डाल में
वियोग और आत्म-द्वन्द की झंझा में
लड़कियां जो चाहती हैं कह नहीं पाती
और जो कुछ कह पाती हैं वह भीतर की आवाज
मन को बेधते रहते गुलाब के कांटे
लड़कियां आधा फूल होती आधा कांटे


                                      कोलकाता,    9 अप्रैल, 2012


टुकड़ा टुकड़ा जीवन
दुनिया के लोग तरह-तरह से सोचते और जीते हैं
वे उसी को दिल से चाहते जो प्राण-पिरोते हैं
बाकी सब जीवन की आपाधापी में अटक भटक जाते हैं
कितना कुछ सत् - असत्, सही, गलत, मान असम्मान
पाप पुण्य, विजय-पराजय,
संबंधों की आत्मीयता, अपनत्व अथवा विभाजन
सभी टुकड़े टुकड़े जीवन को
आत्म-अनात्म धागे से सीते हैं
इसी तरह जीते हैं जीवन पर्यन्त चिन्तन-द्वन्द
जीवन तो बस होता अधूरा छन्द...।

                                             कोलकाता,    10 अप्रैल, 2012   

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