Thursday, 14 June 2012

शब्द का संकट

काले समय की अंधी आंधी से बचाकर
मैं देता हूं शब्दों को आत्म-संरक्षण
करता नई स्थितियों का वरण
इस जन कोलाहल में
सजादा हूं नए सिरे से यात्रा अभियान
जिससे बनी रहे प्रज्ञा शब्दवान....

समय-प्रवाह में चिन्तन की नाव को
आस्था और विश्वास की पतवार से खेते हुए संघर्षरत,
लहरों के आलोड़न से बचता
नाव को नई दिशा देता चल रहा हूं
असाध्य अंधकार में पल रहा हूं
एक विश्वास है कि शब्द बना रहेगा नव प्राणवान।

आह्वान
ओ मेरे आजाद देश के खुशहाल
बड़बोले ऐश्वर्यशाली धनी मानी
भ्रष्ट, काले कारनामों वाले
सत्ता-सिंहासनारुढ़
धन, छल, बल, दल, फरेब और बाहुबल से कुर्सी की राजनीति करने वाले
संसद और विधानसभा की गरिमा को धूमिल करने वाले
पिलाते आमजन को आश्वासनों की घूटी
ओ मेरे देश के पृष्टपोषी, सत्ता भोगी
शब्दों को अपरुप, पराश्रयी करने वाले,
अपने अहम की केंचुल में बैठे शब्द, सत्ता साधक
तुम्हारी सोच की कितनी तश्वारें हैं झूठी
आओ हम मिलकर आजादी की
दशा-दिशा पर चिन्तन करें, सोचे विचारें
आमजन की अभावग्रस्त खाली झोली को भरें।

शब्दगीत
उड़ता हूं स्वच्छन्द
शब्दों के आकाश में निरानन्द
नए-नए शब्द-क्षितिजों में गाते मौन आत्मविभोर
कभी निर्मौन पर्वत के ऊपर मंडराते
चक्कर लगाते, नीली घाटियों, वनों, मरुस्थलों के ऊपर
नदियों, सागर के आर-पार
मैं शब्द हूं। मैं अहम् और लोभ से तटस्थ
गाता हूं अस्तित्व-गीत उनके लिए
जो हैं अभावग्रस्त, संत्रस्त
और अपनी दिशा स्वयं चुनता हूं
मैं नहीं रह सकता व्यवस्थाके पिंचड़े में बन्द...
नेता, अभिनेता,
योगी, महात्मा, धर्मशास्त्री, पंडित, पुजारी,
सतसाईं, मौलाना, पादरी सभी के होठों पर रहता हूं
किन्तु जब देखता हूं आडम्बरी घोलमेल
वे मेरा गलत तरीकों से प्रयोग कर रहे हैं, रचते भयानक द्वंद
तब उड़ जाता हूं खोजने आत्मगीत  के नए छन्द
उड़ता हूं प्राण-संवेदना के विस्तृत आकाश में स्वच्छन्द

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