Tuesday, 19 June 2012

बासी शब्दों के अर्थ

मैं अपने को बार-बार खोलता हूं
फिर बन्द करता हूं किताब के पृष्ठों की तरह
पढ़ता, गुनता जीवन के नए नए अध्याय
खोजता अस्तित्व सुरक्षा के नए नए उपाय
यूं तो जो कुछ बोलता हूं उसमें कुछ न कुछ होती सर्जना
किन्तु  हृदय की भाषा की कितनी होती सत्ता
कितनी होती प्रवंचना, कितना कुछ व्यर्थ होता
समय जानता है
भाषा-गम्य संरचना
और समझता है हमारे होने का अर्थ
यूं तो मन में जो आए बोलता हूं, लिखता हूं
विचारों की तुला पर बासी शब्दों के अर्थ तौलता हूं।


समय की छलना
जो कुछ मैंने सयत्न संजोया, संवारा है
घर, साफे, पर्दे, डाइनिंग टेबुल, कुर्सियां, पर्दे
ठंडी मशीने, आलमारियां, बुकसेल्फ, पेंटिंग्स, कार्निश
सजावट के  विविध सामान
इनके जुटाने में अस्मिता के दर्प को कई बार हारा है
सुविधा-सम्पन्न, वृक्ष, लता, द्रुम, विभि्न पौधों से युक्त
यूं तो घर ऐसा बनाया है
कि सबको लगता प्यारा है
किन्तु इस सबका क्या होगा
जब मैं सब कुछ छोड़कर खाली हाथ चला जाऊंगा
अपने ही समय से छला जाऊंगा।


शब्द बन जाते हैं तीसरी आंख

जो देख सकते हैं अन्तर्मन का स्वरूप साकार
उसकी नफरत, घृणा,
उसका औदार्य, प्रेम, करुणा, मनुहार
शब्द ही बनते हैं अशोभन व्यवहार
बनते, बनाते स्वस्थ मानसिकता के विविध आयाम
बनते मनुष्य के प्रत्येक कर्म की साख...

शब्द हृदय अथवा मस्तिष्क-सागर से
स्वतः उत्सज होते हैं
और जब भी चेतना का रंग धूमिल होता है
तब कई स्तरों पर अपनी पहचान खोते हैं
शब्द की प्रकाश पुंज से भरी चिनगारी है
जो दबी होती है नीचे, ऊपर होती अस्तित्व की राख

शब्द बनाते हैं दनिया के प्रत्येक जीव को
सानवान, अर्थवान, प्राणवान, मूल्यवान
किन्तु शब्द ही बनाते हैं जीवन को कटुता और नफरत के बीच नर्कवान
दुनिया के आदि और अंत में
सिर्फ शब्द की सत्ता होती है
जो आप, अदृश्य, गोपनता ढोती है
हमारे भीतर बाहर दृष्टिगत नहीं होती तीसरी आंख



प्रेम का ताना बाना
रुको, आंचल न सरके सीने से
पहन लो आभूषण करीने से
कर लो साज
लगता है वर्षा होगी आज....
प्रेम में अच्छा होता मरने, जीने से
चंचल जकड़ाव से
जो रति-गति, संगति की गन्ध फैलती है पसीने से
ऐसे क्षणों में
किसे नहीं होगा गर्व, नाज...
प्रेम में रुको नहीं, समय को पानी की तरह मत बहाओ
पग से पग बांध चलते चले जाओ पीछे न मुडो,
न देखो क्योंकि जीवन में अतीत बड़ा खतरनाक होता है
प्रेम का ताना बाना छिन्नभिन्न हो जाता है
जब गिरती है अतीत की गाज...

खुले आवरण में
शरीर का अंग-प्रत्येग वैभवशाली लगता है
और बस एक मधुस्मिति - उषाकाल जैसी रेखा
मन को आकर्षण-जाल में बांध लेती है
ऐसे में जीवन का मिलन- तीर्थ
कितना सार्थक होता, मित्र, सखा, चहेता
जो मन की सारी कलुष धो देता
प्रेम, कली की ततरह खिल जाता है
जब हृदय-वसन्त समीर  धीरे-धीरे बहती
नव नवेली वधू करती सोलह साज....

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