Saturday, 25 February 2012

जिया-अनजिया सत्य

हमने आश्रय के लिए घर बनाए
और रोटी के लिए तरह-तरह के उपाय किए
कभी सुख, कभी दुःख में जिए....

हमने अपनी आकांक्षा और सपनों के पंख खोले
विविध दिशाओं में उड़े
बहुत सारी स्वार्थ की भाषाएं बोले...

हमने दूसरों का सुख चैन अपने लिए छीन लिए
अपने को औरों से अधिक साधन-सम्पन्न बनाए
अंतःकलह और प्रवंचना को कहां छोड़ पाएं...

हमने प्रेम किए किन्तु प्रेम के लिए त्याग और समर्पण नहीं किए
अपना नहीं छोड़े, दूसरे का अधिकार छीनकर
इसी तरह जिए चाहत के जाल में
सदा अमृत पान के लिए
दिए अथवा अनपिए जिए।

नहीं बन पाते फूल या मकरंद
दिन प्रतिदिन मन में बहुत सारा होता है द्वन्द
कभी सपने आकांछाए टूटने से क्षुप्ध
मनोरोग से आक्रांत हम हो जाते सीमित सीमाओं में बन्द

दिन प्रतिदिन हम कितने सारे मनसूबे बनाते हैं
और उन्हें सफल बनाने अपना सर्वस्व दांव पर लगाते हैं
कितनी बार, कितनी तरह से खंडित होता आनन्द
मन की शांति, दिमाग का सुख चैन
जन्म लेने से मृत्यु पर्यन्त
जोड़ नहीं पाते हम जीवन का नवछन्द
प्रेम और जीवन के साथ नहीं हो पाता गहरा अनुबंध

दिन प्रतिदिन मन में उमड़ता घुमड़ता द्वन्द
किंकतर्व्य विमूढ़ता से जब हृदय कपाट हो जाते बन्द
प्रेम जैसे शब्द लगने लगते विनार्थ बेमानी
हम जीवन के वसन्तोत्सव में बन नहीं पाते फूल या मकरन्द

अजाने समय का धृतराष्ट्र
आहत मन साध लेता मौन
भीतर कौन पैठकर पीड़ा देता है?
कौन आंखों के आकाश से
अश्रुवर्षा करता है और
हमारी आकांक्षाओं को अपने घटाटोप से
छायांकित कर लेता है
कौन हृदय को मथता है
काले समय की मथनी से
अवसाद के क्षीर से दुखों का मक्खन निकालता है
और हमारे पीड़ा भरे घावों पर उसका लेप लगाता है
और हमारे सपनों को अपाहिज बनाता है
वह कौन है
 जो दृष्टिहीन धृतराष्ट्र के रूप में समय-असमय
आस्था के कुरुक्षेत्र में हमें हराने आता है
आखिर वह है कौन?

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