Friday, 3 February 2012

प्रेम-सत्ता

प्रेम के आगोस में मनुष्य को ही नहीं
जड़ चेतन, पशु पक्षी को बांधा जा सकता है
प्रेम से ही ईश्वरत्त्व-बोध साधा जा सकता है
प्रेम ही इस धरती पर जीवों को आनन्द सुख देता है
प्रेम की बस एक ही शर्त है -
जो निश्छल मन अपना सर्वस्व देता है
वही प्रेम-सगाई का अंतरंग आनन्द-सुख लेता है
प्रेम में अपने को अपने से अलग करना जरूरी है
लोभ-लाभ की दृष्टि से प्रेम-जाल बुनना
और उसमें अपने आत्मीय को बांधना निरा मजबूरी है।
                                                             -18.01.2012

विषपायी जीवन
मैं जिन जिन राहों पर चला
वे सभी पीछे छूट गई हैं
बस एक स्मृति रेखा खिंच गई है
अन्तर मन में
ऐसे में अपने पथ पर आगे बढ़ते जाने पर
मैं देखता हूं शताब्दी का उभरता हुआ नया स्वरूप
वर्तमान के क्षण-प्रतिक्षण,
कण-कण में परिवर्तन चेतना की चादर बिछ गई है।
पौरुष और विश्वास ने हार नहीं मानी
और प्रवंचना के आकाश में ऊंचे, बहुत ऊंचे
दुराशा की जो पतंगें उड़ रही थीं
पलभर में
दृढ़ निश्चय की डोर से टूट गई
मैं सागर-तट पर बैठा
देख रहा अस्तित्व-अनस्तित्व की लहरें
बार बार आकर चेतना के विस्तृत खुले हुए तट को
चपल चंचल चतुर प्रेमातुर समर्पण जल से
भिंगो जाती हैं और
अनमने मन लौट जाती है
फिर नई ऊर्जा लेकर आती हैं
तट को छू जाती हैं
अथवा उसे अवगाहित करती हैं
हृदय-मन जलप्लावित कर
जीवन का नया संदेश दे जाती हैं -
जीना है तो तटस्थ तटकी तरह नहीं
लहर की तरह जीना है
अमृत के साथ विष भी पीना है
विषपायी होना है।
                                                         19.01.2012

महानाद-स्वर
संप्रीति का महानाद स्वर जब झंकृत होगा
जन-मन में
बदलेंगी अनास्था, अविश्वास, अन्तर विरोध की धारा
और कुव्यवस्था की स्थितियां,
कर्म-चेतना, अभिव्यक्तियां
सार्थक होंगी जीवन की, क्षण-प्रतिक्षण के परिवर्तन में।
हटेगा अंधकार भऱा कुहासा
मानव होगा विजयी प्रत्येक संघर्ष में
परिवर्तित होगा जीने का स्वरूप हर्ष -आनन्द में
परिष्कृत, स्पष्ट प्राण-दर्पण में
संप्रीति का महानाद-स्वर
जब-जब झंकृत होगा कण-कण में
जन-जन में
इतिहास अपने ही गर्त में गिरकर विलीन हो जाता है
किन्तु हमारी संघर्षशक्ति, आस्था
अनन्त काल तक अपराजित रहेगी
मनुष्य का उत्थान अपने आत्मबल से होगा
युग बदलेंगे,
चलता रहेगा नव परिवर्तन अनवरत,
हमारी चेतना के विविध आयाम में
नए नए इतिहास बनाते रहेंगे,
मनुष्यता की होगी विजय
अनपेक्षित विपरीत परिस्थितियों में
काल का महानाद-स्वर संप्रीति की धुन पर
झंकृत होगा जन-जन में......
                                      20.01.12

भाग रहा जीवन
तेजी से बह रही हवा
हमारे भीतर बाहर
सड़क पर, पल्लिपथ से लेकर राजपथ पर
सिवान से नगर तक
भाग रहा जीवन द्रुतगति से
पृथ्वी से महा अंतरिक्ष-पथ पर
महाशक्ति बनने का सपना लिए
भाग रहा मानव
इस छोर से उस छोर तक
बह रही हवा अपने साथ ले जाती
मनुष्य के संघर्ष की व्यथा-कथा-स्वर
हो रहा आत्म विमर्ष का अवसान
हमारे भीतर बाहर
अस्तित्व भाग रहा अग्नि-पथ पर
आशा विश्वास लिए
प्राण में नवोच्छ्वास भर
                                                     21.01.2012

No comments:

Post a Comment