Wednesday, 15 February 2012

जाने का दम

जिया बहुत
बहुत जिया
जितना लिया
इतना दिया
मेल-बेमेल
संबंध प्रबंधन का
अमृत-विष पान किया
जिया बहुत जिया...
जलाया मन का अपनत्व-प्रदीप
संप्रीति की बाती
आस्था के तेल से
विश्वास की थाती के साथ
जीवन को आलोकित किया
जिया बहुत जिया...
संघर्ष और कर्म के बीच
जो भी जितना मिला
वही तो लिया
प्रेम के बहुरंगी चित्रों से सजी
चाहत की चादर
जब भी फटी कटी
हृदय की सुई से सी लिया
जिया इसी तरह जिया....

                                   कोलकाता-  23.01.12



चलना ही जीवन-अस्तित्व
और कितना चलना है
जीवन तो बस एक मायावी-छलना है
हमें तीव्र गति से प्रवाहित समय-परिवर्तन धारा में
कर्म की लहरों के थपेड़े सहना है
इसी तरह आगे बढ़ना है
नए युग के सांचे में ढलना है

समय का बहाव चाहे जैसा हो
उसे रोक नहीं सकते
उस बहाव में इतिहास, स्मृतियां, अतीत का उच्छिष्ट
सब कुछ विलीन होता
 इयत्ता का स्वरूप खोता
वर्तमान के पड़ाव में रुकता,
और फिर चलता भावतव्य की ओर
यही अस्तित्व के होने, न होने का क्रम समय की भट्टी में
नए-नए रुपों में ढलता है
आह! मैं पूछता हूं अपनी नियति से
और कितना चलना है...

चलते रहने के अतिरिक्त कोई उपाय भी तो नहीं
रुकना कष्ट कारक है
पीछे भागना आत्मदंश है
चेतना का विध्वंस है
हमें नई ऊर्जा के साथ बदलना है
नव्य-पथ पर चलना है....
                        
                              कोलकाता-  24.01.12


सत्ता की शीत लहर
चारों ओर शीत लहर
ठंड से कंपकपीं, लहचल
कुलू, मनाली, शिमला, श्रीनगर, लेह, दार्जिलिंग
हिमलयी-उत्तर से उत्तरांचल, पूर्वांचल
कुम्भ मेला, कल्पवास के लिए संगम तट पर जुटे
ठिठुरते भक्त, कांपते
जवान, बूढे-अशक्त
ऊपर से वर्फीली हवा का कहर....

गंगा भी ठंड से कांप रहीं
तीव्र प्रवाह के साथ सागर की ओर
चंचल उद्वेग से बह रहीं
भक्तों से कह रही.
शीत, ताप, दुख, सुख अस्तित्व के आधार हैं
बिना कोई हलचल, संघर्ष, जीवन एक भार है
चैतन्यपूर्ण रहना है हमें हर प्रहर.....

चारों ओर शीत लहर का कहर
फटेहाल किसान, दलित, कामगार, खेतिहर
टूटी फूटी झोपड़ी की तरह भग्न जिंदगी, भागती
सतत् संघर्ष शीत, पल्लिपथ से शहर दरशहर
संकटग्रस्त है आदमी
चाहे प्रकृति की मार हो
कुव्यवस्था, सत्ता का विषाक्त जहर...

              कोलकाता-  25.01.12


झंडा ऊंचा रहे हमारा
वन्दे मातरम का देशगान-स्वर
गूंज रहा सारे भुवन में
भारत-जन-सागर-तट पर प्रच्छालित
चेतनाकी चंचल गति से प्रवाहित नदियों की लहरों में
आत्म विश्वास से भर
कि विश्व में होंगे हम अद्वितीय, महान
विश्व विजयी होगा ध्वज हमारा
बढ़ेगा सम्मान क्षितिज के आरपार
गूंजेगा वन्दे मातरम्   स्वर
आनन्द प्रभा से आलोकित होगा जग सारा
जन-जन को देंगे संप्रीति, प्रेम-सुख
मानवता को बाहों में भर
बोलेंगे हम सभी एक प्रण-स्वर न्यारा -
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।

                                   कोलकाता - 26.01.12




स्वप्न चित्र

प्रतिदिन मैं सूर्योदय होते ही सोते से जग जाता हूं
अपनी दिनचर्या पर लग जाता हूं
सबसे पहले अखबारी समाचार बांचता हूं
अथवा रेडियो, दूरदर्शन पर देखता हूं
देश-विदेश की खबरें
और सत्ता के लोभ-लाभी बाजार में
सपने बेचते सत्ता के दलाल..... चल देता हूं

मैंने आत्म विश्वास की तूलिका और संप्रीति के रंगों से
जो सपनों के कैन्वश चित्रित किये थे
और उन्हें  सागर, नदियों के तट, पर्वतों, झरनों, मरुस्थलों,
हरियाली के बीच 
लेकर सत्ता की बाजार में बेचने आए थे
लोभ, प्रवंचना, झूठ, लूट के सामने
कहीं भी टिके नहीं
एक भी चित्र बिके नहीं
हाय, कितने चाव से बनाए थे मैनें सपनों के रंग-विरंगे चित्र
धोखा, फरेब और बेईमानी के बाजार में
नहीं मिला कोई क्रेता, आत्मीय, मित्र
मैं सपनों के चित्र कंधे पर रखे हुए
समय-सागर-तट पर चलता जाता हूं
रोज व रोज एक नया स्वप्न चित्र बनाता हूं
और भविष्य की ओर बढ़ता जाता हूं।

                              कोलकाता - 27.01.12


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