Thursday, 6 October 2011

स्मृति-व्यामोह

मस्तिष्क-आकाश के आर-पार
जब कुहासा बनकर छा जाती हैं स्मृतियां
बहुत कठिन होता है
अतीत को भुला पाना
और पा लेना उनसे निस्तार
भग्न-हृदय गर्भ में मात्र स्मृतियां अवशेष रह जाती है
जैसे जैसे समय बीतता जाता
वे अस्तित्व-विहीन हो जाती
बची रहती है दुर्निवार अभिव्यक्तियां
जिन्हें कोई कृतिकार
अपनी तूलिका से
हृदय संवेदना का रंग भर
बना देता कालजयी कृतियां।
इसी तरह आजन्म मस्तिष्क के क्षितिज पर
मंडराती रहेगी
अविसर्जित स्मृतियां।

और इसी तरह हमारा वर्तमान
क्षण-प्रति-क्षण हमसे खो जाता है
स्मृतियों का हृदय-समुद्र-तट सर्वांग भिंगोता
उस समय भले ही हम
यह दृश्य देखने के लिए रहें या न रहें
खण्डित जीवन-अस्तिव-सत्य को
रूपायित करती रहेगी नव्य-संस्कृतियां
अंततः हमसे कभी अलग नहीं हो पाती स्मृतियां।

Ignorance of Remembrance
Across the mind-sky
remembrance over-spread like the mist
It's not possible
to forget the past
and get released from the by gone days
In the womb of broken hearts
Only memories are left as remainder
with passage of time and they too
lose their substance.
But then their expressions
Are inevitably treasured
Some adroit artist paints them
with his chivaliric sentiments
makes them transcend the vayages of time

likewise the unabandoned memories
hover over the horizon of our conscience
till the end of life's race
And, likewise, our present is lost
Every movement at any space.

The seashore of our heart
drenches whole personality whether-we are alive then
or not to witness the scene
The new cultures will go on
Concretising the truth of life's past existence
after all, memories never depart from us.

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