Monday, 10 October 2011

कविगुरु रवीन्द्रनाथ और बांग्ला साहित्य

बंगला साहित्य, लोक संस्कृति और बंगाली स्वाभिमान के केन्द्र विन्दु गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर हैं। एक संवेदनशील कवि हृदय, ठाकुर परिवार के राजकीय ठाठ बाट, ऐश्वर्य, संभ्रांत मानसिकता से संपृक्त नहीं हो सका। कैशोर्य काल में उसके भीतर आत्म-सौन्दर्य की विविध रूप छठा नव अभिव्यक्ति, नए-नए परिवेश में उत्सृज होने लगी। उसका मन चंचल पंछी की तरह कभी कलकत्ता में चित्तपुर स्थित भव्य प्रासाद के विशाल प्रांगण में विचरता, कभी छत पर उमड़ते-घुमड़ते बादलों को देखकर अति प्रसन्न हो उठता। कालीदास के मेघ उनकी आत्मा को रस-अनुरक्त करते रहे।

गोरा साहबों की ऐय्याशी भरी रंगरेलियां, गरीब असहाय भारतीय मध्यवित्त परिवार की ललनाओं के रूप लावण्य का शोषण, दासता का तांडव तथा तथाकथित भद्र बंगाली महाशयों का अंग्रेजों के साथ मिलकर बंग बालाओं की रचित रूपकथा का दुखान्त पटाक्षेप, इन सभी घटनाओं का असर रवीन्द्रनाथ की  किशोर चेतना को दुखी और अकेला छोड़ दिया। राज परिवार का कोई सुख उन्हें रास नहीं आता था। वे एक तरह से मनसे दरिद्र राजवंशी थे। स्वतंत्र पंछी की तरह उन्मुक्त विशाल आकाश में उड़ना चाहते थे और यही सोच उन्हें शांतिनिकेतन के निर्जन आम्र, पलाश, नारियल के पेड़ों के बीच खींच ले गई जहां वे खूब लिख रहे थे, कविताएं, नाटक, कहानियां, उपन्यास, रम्य-रचनाएं आदि। उन्होंने रंग मंच की स्थापना भी की शांतिनिकेतन में की। 1901 में शांतिनिकेतन की स्थापना की। पौष मास की पूर्णिमा को स्कूल आरंभ किया। नाम रखा विश्व भारती। श्री निकेतन में हस्तशिल्प-स्कूल आरंभ किया। इसके लिए उन्होंने अर्थ जुटाने के प्रयास में पत्नी श्रीमती मृणालिनी देवी के गहने तक बेचे।
जब गांधी जी शांति निकेतन में कवि के आमंत्रण पर विशेष अतिथि के रूप में आए तो गांधीजी को कवि ने कहा, हे महात्मा, आपका स्वागत है। आजादी की लड़ाई में मैं भी आपके साथ काम करना चाहता हूं। गांधीजी ने मुस्कराते हुए कहा- कवि गुरु आजादी की लड़ाई में आपकी जरूरत है।  उसी दिन से गांधी जी महात्मा कहलाए और कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कवि गुरु के नाम से प्रसिद्ध हुए।
कवि गुरू प्रतिदिन नियम पूर्वक चार बजे उठते थे। नित्य कर्म से निवृत होकर शांति निकेतन के भीतर-बाहर टहलते थे। फिर किसी वृक्ष की जड़ों पर बैठकर पंछियों क कलरव सुनते, कविताएं लिखते। कवि गुरु की 1919 से 1939 तक की जितनी कविताएं हैं, उनमें किसी न किसी पंछी स्वर की अनुगूंज प्रच्छन्न रूप में सुनाई देती है। इस बात को रवीन्द्र संगीत की श्रेष्ठ गायिका सुचित्रा मित्रा ने एक बार बातों बातों में कह दिया। उनके गीत स्वरों में कोकिल, हारिल, मैना तथा अन्य पंछियों के बोल का माधुर्य मिश्रित है।
कवि गुरु का अन्तर्मन हमेशा उद्दिग्न रहता था। इसीलिए वे भारत तथा विदेशों में अधिक यात्राएं करने के लिए कार्यक्रम बना लेते थे। 1912 में ग्यारह देशों की यात्राएं की। इन यात्राओं में कई सुप्रसिद्ध लेखकों के साथ परिचय हुआ। ईट्स, विलियम रोथेस्टाइन उनके अच्छे प्रशंसक बने। उन्हीं की सहायता से कवि ने अपने गीतों के संकलन गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद तैयार किया जिस पर उन्हें नोबुल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पुरस्कार से प्राप्त एक लाख बीस हजार रुपए शांतिनिकेतन को दे दिया। यायावरी प्रवृत्ति बड़े कवि का स्वभाव बन जाती है। कवि ने कई जगह अपने प्रवास के लिए घर बनवाए अथवा बना बनाया घर खरीदा-दार्जिलिंग, कर्सियांग, रांची, कटक, पुरी आदि जगहों में कविगुरु प्रायः जाकर रहते थे। प्रकृति के साथ उनका सम्मोहक संबंध उनकी कविताओं को ऊर्जा प्रदान करता था। कवि के लिए प्रकृति प्रेमी होना, स्वच्छन्द विचरण करना रचना प्रक्रिया के लिए जरूरी होता है। विविध संदर्भों से जुड़ना, अपने को भीतर से खोलना कवि का स्वभाव होना चाहिए। समष्टि के प्रति प्रेम भावना की अभिव्यक्ति कविता को महान बनाती है। कवि गुरु अपने लेखन में बेहद व्यस्त रहते थे। उन्होंने कविताएं, कहानियां, उपन्यास, प्रबंध सब में महारात हासिल की है। ऐसा बहबहुत कम लोगों से मिलते थे और जब किसी से मिलते थे तो अपनी कविताओं पर चर्चा करने से बचते रहते थे। बस कुछ व्यक्तिगत बातें कर लेते और उठकर भीतर चले जाते। रवीन्द्रनाथ का अपना स्वभाव था, अपना मूड था, उसमें कोी दखलंदाजी नहीं। कोई व्यवधान नहीं। वे स्वतंत्र मनश्चेता के स्वच्छन्द कवि थे। ऐसा बहुत कम साहित्यकारों में देखा जाता है।
कवि गुरु ने बड़े आर्थिक संघर्ष से विश्वभारती का विस्तार किया, हिन्दी भवन की स्थापना की। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वान को हिन्दी भवन का प्राचार्य बनाया। उनमें हिन्दी, हिन्दुस्तान, हिन्दू के प्रति असीम आदर भाव था, लेकिन वे ब्रह्म समाज से जुड़े रहे। ब्रह्म समाज का मंदिर भी शांतिनिकेतन में बनवाया। वे बंगला और हिन्दी को सहोदराएं कहते थे। बंगाल से बाहर जहां भी जाते बातचीत में हिन्दी का प्रयोग करते थे। उन्होंने गांधी जी के अनुरोध पर वर्ष 1920 में गुजरात विद्यापीठ के दीक्षान्त समारोह में हिन्दी में भाषण दिया और भी कई अवसर पर हिन्दी में बोले। कवि की वाणी में वाग्देवी विराजती थीं इसलिए भाषा का प्रवाह रुकता नहीं था। काव्य लेखन में वे महान थे। गुरुदेव ने बंगला कविता को नई भाव भूमि, नव संप्रेषण, छान्देयता और प्रकृति-छठा के विविध आयामों से समृद्ध किया। बलाका संकलन की चंचला कविता में कवि लिखते हैं -

रे कवि आज तुझको चपल चंचल बना डाला
नवल झंकार-मुखड़ा भुवन की इस मेखला ने
अलिखित पद संचरण की अहैतुक-निर्वाध गति
नाड़ियों में सुन रहा हूं कोई चंचल आवेग की पग-ध्वनि
वक्ष में रण रंजित दुःस्वप्न
कोई जानता नहीं
नाचती हैं रक्त में उदधि की लोल लहरें
कांपती है। व्याकुलता वनों की
याद दिलाती वह पुरानी बात-
युग-युग से चला हूं
स्खलित हो होकर
सदा चुपचाप रूप से रूप में ढलता हुआ
प्राण से प्राण में
प्रातः या निशीथ
जब जो कुछ मिला है हाथ में
देता गया हूं
दान से नवदान को
इस गान से उस गान को...

निम्नलिखित कविता कविगुरु की मरने से लगभग वर्ष भर पहले की है जिसमें जीवन का मूलमंत्र है। 
जप की माला अत्यंत प्राण अस्तित्व धर्मी है।
आने जाने वाली राह के किनारे नितांत अकेला बैठा हूं
गीतों की नाव को जो सबेरे प्राणों के घाट पर
धूप छांह के नित्य रंग मंच पर ले आए थे
सांझ की छाया में धीरे-धीरे खो गई।
आज वे सब मेरे स्वप्न लोक के द्वार पर आ जुटे हैं
जिनका सुर खो गया, वे व्यथाएं अपना इकतारा खोज रही हैं
एक एक कर प्रहर जो बीतते हैं, बैठा-बैठा गिनता हूं
अंधकार की शिरा-शिरा में जप की नीरव भाषा ध्वनित हो रही है।
किसी भी कला के लिए लोक संस्कृति के साथ बंधना जरूरी होता है। यदि उसे नया स्वरूप देना है तो उस नव-स्वरूप के साथ संबद्ध होना तथा उस संस्कृति बोध को अपनाना प्रत्येक जागरूक साहित्यकार के लिए आवश्यक होता है। इस अर्थ में कवि गुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शांति निकेतन के आसपास रहने वाले गरीब, अपढ़, वनवासियों के साथ नृत्य, गान करते, अक्सर कोई न कोई पर्व पर उत्सव होता, खान पान होता, नृत्य संगीत का रात भर समा बंधता, कवि उस लोक नृत्य गान के रस में डूब जाते थे।। पौष मेला, बड़े दिन के अवसर पर 20 दिसम्बर से प्रारंभ होकर महीनों चलता है। जिसे बंगाल का संस्कृति मेला भी कह सकते हैं। कवि गुरू ने हमेशा लोक जीवन के संस्कारों को प्रोत्साहित किया, नई राह दी, उससे गहरे से जुड़े रहे और भारतीय बंग-लोक संस्कृति को नया आयाम तथा नई ऊंचाई प्रदान की।
गुरुदेव जीवन पर्यन्त कर्मशील रहे। वे आम साहित्यकारों की तरह आलसी, कामचोर, नखरेबाज, दलबंद, आत्म-प्रगल्भी, लोभी कभी नहीं रहे। राज परिवार से उनका मोह बचपन में ही टूट गया था। वे अकेलापन अनुभव करते थे, परन्तु कर्म ने उन्हें उस टूटन, बिखराव, मोह और घुटन से ऊपर उठाया। वे साहित्य कर्मयोगी थे और साहित्य कर्म से मरने के दिन तक जुड़े रहे। उन्होंने मृत्यु का आभास पाकर लिखा था -
सामने शांति-पारावार
खोलदो नाव हे कर्मधार....
गुरु देव चाहते थे कि मृत्यु के समय यही गीत गाया जाए। परन्तु गीत-स्वर भी तो समय अपने प्रवाह में बहाकर ले जाता है। कवि ने 7 अगस्त, 1941 को राखी पूर्णिमा के दिन अपनी आंखें सदा के लिए मूंद लीं। रह गए उनके गीत जो आज बंगाल के जन जीवन में व्याप्त हैं। बंग-संस्कृति और काव्य का अर्थ ही है गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर। परन्तु गुरुदेव के बाद की बांग्ला-पीढ़ी उनके हिमालय जैसे ऊंचे व्यक्तित्व के सामने साहित्यिक दैन्यता से ग्रस्त है। यह बांग्ला साहित्य की राह में बाधा की सृष्टि उपस्थित कर रहा है। नया रचनाकार इस बात से खिन्न और हीन भावना से ग्रसित है।
रूपाम्बरा की 46 वर्ष की यात्रा
रुपाम्बरा के प्रकाशन का यह 46वां वर्ष है। प्रवेशांक मई 1965 में शलभ श्रीराम सिंह, शिव कुमार और स्वदेश भारती के संयुक्त संपादन में प्रकाशित हुआ था पत्रिका के प्रवेशांक का नारा था- युयुत्सावादी नव लेखन प्रधान साहित्य संकलन। दूसरे अंक से ही शलभ अलग हो गए और शिवकुमार भी। उसके तत्काल बाद युयुत्सावाद की सोच आधुनिक साहित्य चिंतन में बदल गई। रूपाम्बरा की 46 वर्षों की यात्रा के बीच कई महत्वपूर्ण विशेषांक प्रकाशित हुए। साधारण अंकों के अतिरिक्त सातवें दशक की श्रेष्ठ कहानियां, नवलेखन विशेषांक, अधुनातन कवितांक, अज्ञेय-विशेषांक तथा 22 भाषा-साहित्य विशेषांक में अब तक लगभग 1860 विशिष्ट लेखकों की रचनाएं प्रकाशित हुई जिनमें  अत्यधिक मूल्यवान, पठनीय तथा संग्रहणीय सामग्री संग्रहीत है। आज अर्थाभाव में पत्रिका को जीवित रख पाना जोखिम का काम है। रूपाम्बरा की साहित्य लेखन-प्रकाशन-यात्रा में नया प्रतीक, शताब्दी, लहर, कल्पना, आलोचना, समीक्षा जैसी पत्रिकाएं बंद हो गईं। परन्तु साहित्य और भाषा की मशाल लिए रूपाम्बरा साहित्य के कंटकाकीर्ण पथ पर डगमग पग चल रही है और उसे लेखकों तथा साहित्य के पाठकों का भरपूर सहयोग प्राप्त होता रहा है।

बिखराव में जी रही हिन्दी
हिन्दी में छायावाद युग से विरोध, ईर्ष्या, अहंकार, अहम के वातावरण की सृष्टि हुई। प्रसाद, पंत, महादेवी, निराला ने मनसे कभी भी एक दूसरे को स्नेह, सम्मान, आदर भाव नहीं दिया। मंचों पर या व्यक्तिगत बातचीत में वे एक दूसरे की प्रशंसा से बचते रहते। 1950 में ही या यूं कहूं  कि महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा रामचन्द्र शुक्ल काल के बाद आलोचना-प्रत्यालोचना की जो अधोगति हुई, उससे हिन्दी में व्यक्तिगत आलोचना का छद्म-युद्ध प्रारंभ हो गया। दल बद्धता, गोत्रवाद के कारण हिन्दी का श्रेष्ठ साहित्य उभरकर सामने नहीं आ पाया। बहुत सारे लेखक निराश होकर लिखना ही बंद कर दिए। 60 के बाद तो स्थिति और भी जटिल हो गई।
1942 में अज्ञेय के संपादन में तार सप्तक प्रकाशित हुआ। यह हिन्दी के सात चुने हुए कवियों की कविताओं का संकलन था। इस संकलन ने आधुनिक हिन्दी कविता को नया आयाम, नई सोच, नई दिशा दी। परन्तु जो इस संकलन में शामिल नहीं किए गए, अलग से मंच बनाकर विरोध का स्वर ऊंचा किया, वस्तुपरक आलोचना से हटकर व्यक्तिगत आलोचना का रास्ता चुना। मार्क्सवादी चिन्तन से प्रभावित कुछ साहित्यकारों ने अन्य लेखकों को पैट्रीबुर्जुआ (सामंतवादी सोच के लेखक) मानकर उनके विरुद्ध मुहिम छेड़ दी। 1950 से 1970 के बीच नई कविता, समान्तर कहानी आदि के आंदोलन चले और शीघ्र ही उनकी अकाल मृत्यु हो गई। किन्तु दलवादी लेखकों का गिरोह जनवाद, प्रगतिवाद का दामन थाम कर सर्जनात्मक लेखन का बहुत बड़ा अहित किया। इन आंदोलनों तथा दलगत राजनीति के कारण हिन्दी साहित्य में सह-हित की भावना तिरोहित हो गई और 1980 से अब तक जो कुछ लिखा गया उसमें कितना सार्थक, कितना सर्जनात्मक साहित्य है उसे हिन्दी के सुविज्ञ पाठक जानते समझते हैं। राजनीति में जिस प्रकार भ्रष्टाचार व्याप्त है, वही हाल दलगत लेखकों, प्रतिपक्षी लेखकों द्वारा रचित भाषा-साहित्य-सर्जन का भी है। इससे हिन्दी लेखन कमजोर हुआ है और राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हिन्दी अपनी लेखकीय ओजस्विता में कमजोर हुई है। जिस भाषा में सर्जनात्मक साहित्य की श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती, वह भाषा कमजोर और रोगी हो जाती है। अब हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार में श्रेष्ठ साहित्य रचना की जरूरत को गहरे से महसूस किया जा रहा है जो विश्व मंच पर हिन्दी को अन्य भाषाओं की तुलना में गौरवपूर्ण प्रतिष्ठा प्रदान कर सके।
- स्वदेश भारती
उत्तरायण
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