Sunday, 2 February 2014

दो चेहरे

मेरे जुड़वां प्राण
उन्हें कैसे पालूं!
एक है भीतर जैसा
बाहर नहीं दिखता वैसा
दूसरा है बाहर जैसा
भीतर नहीं वैसा
विचित्र है उनकी समरसता
ऐसे में उन्हें कैसे संभालूं
मेरे जुड़वां प्राण
उन्हें कैसे पालूं।

पहले को चाहिए सुनहरी मंजिलें
और दूसरे को चाहिए अस्तित्व समुद्र-अन्तर्मन
जिसके किनारे बैठे
देखा करें उद्वेलित लहरों का विसर्जन!

पहले को चाहिए प्रेम का संवरण
और दूसरे को प्रेम की परिभाषा
नीली घाटियां, रजत रश्मियों वाले पर्वत
बसन्त में खिले फूलों की हंसी
आदिम आकांक्षाएं-
कि कितना आकाश
बांहों में भर लूं
मेरे जुड़वां प्राण
उन्हें कैसे पालूं।

पहला अपनी बात नहीं कहता
सोचता अंदर-ही-अंदर
बनाता बहुत सारे मनसूबों के रेत -घर।
और दूसरा सोचता फिर उसी
सोच के अर्थ को नकारता
पहला असहाय हो जाने पर आंहें नहीं भरता, न ही कराहता
एक सपने से टूटकर दूसरे से जुड़ने का क्रम संजोता
पर दूसरा बिलखकर अपनी ही बांहों में
माथा छुपा लेता
एक भयानक मौन-चीख के बीच
नई आशाएं सर्जित करता कि प्राणों के कैन्वस पर
कितने रंग सजा लूं
मेरे जुड़वां प्राण
उन्हें कैसे पालूं।

- स्वदेश भारती 
(भारतीय कविताएं 1987-88 (ज्ञानुपीठ प्रकाशन) से साभार, उद्धृत)

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