Monday, 1 April 2013

जुविली हिल्स

तुम्हारे चाहत भरे दिन का
जब अवसान होगा
अंधकार घिर जायेगा
उस अंधकार में
नए स्वप्न-बीज अंकुरित होंगे
नवप्रभात में
अपनी श्यामल हरीतिमा से
जन-मन को शुभांच्छित करेंगे
जीवन की रस-धार
हमारी आकांक्षा के खाली स्रोत भरेंगे।

एक चाहत के पास दूसरी चाहत
इसी तरह तीसरी, चौथी
इसी तरह क्रमागत सपनों का संसार सजेगा
मन की आकांक्षा का सितार
नव राग में बजेगा


बैंगलोर
26.02.13




जीवन पथ कई तरह से, कई बार
अपने गन्तव्य से
दूर होता गया
आकांक्षा का सर्जन-बीज
मन की माटी में बोता गया
और जो वृक्ष सघन हरियर छायादार बना
उसी के नीचे बैठकर
अपने को एकनिष्ठ किया
नियति के बहुरंगी खेल में
सम्मिलित होकर जिया
दूर करता रहा
दुर्भाग्य का अंधकार
कई तरह से, कई बार...

अपने गन्तव्य-पथ में
नितांत अकेला चलता रहा
सपनों के बीच
नई आकांक्षाओं के साथ पलता रहा
याद किया अतीत के टूट सम्बन्धों को
मन से जुड़े मन के अनुबंधों को
जीवन-समुद्र में
दुख सुख की उर्मियों का आलोडन
अजस्त्र-प्रवाल-सैलाब में मचलता रहा
अगाध अनन्त के बीच कई बार



बैंगलोर
27.02.13





गन्तव्य की तलाश
शब्दों को नई परिभाषा
नया अर्थ-बोध देने के लिए
मैंने आकाश, धरती, सागर,
सूर्य और हवा से लिया सत्त्ववता
प्रकृति  की सौन्दर्य-नवता के
विविध उपादान ग्रहण किए
और वही तो जन-जन को दिए....

शब्दों का महत्व मैंने तब जाना
जब जीवन के दोराहे पर खड़ा
गन्तव्य की तलाश का नया पथ खोजा
यूं तो कभी लगा नहीं
संघर्षों की व्य्था जीवन का बोझ
नए पथ पर चलता रहा
नई आशा- प्रदीप समष्टि के लिए....

बैंगलोर

28.02.13














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