Wednesday, 11 April 2012

मैंने कभी अंधकार ओढ़ा नहीं

मैने कभी अंधकार ओढ़ा नहीं
सदा प्रकाश के लिए यत्न करता रहा
रोशनी से अंतर्मन भरता रहा
और उजाले का आंचल पकड़े हुए
अपने रास्ते पर चलता रहा
वह आंचल कभी छोड़ा नहीं....

कई बार अंधकार ने अपने चक्रब्यूह में
भ्रमित किया। कई बार मेरी रोशनी को
काटने, बांटने, आंटने की कोशिशें हुई
कई बार मेरे पथ पर कांटे बोए गए
असमय की प्रवंचना भरी वर्षा से
मेरे दिनकाल भिगोए गए
किन्तु मैं समय को
मुट्ठियों में कस कर थामे रहा
कभी भी उससे संबंध तोड़ा नहीं...

थामे रहा समय का हाथ
गाहे बगाहे यदि छूट भी गया उसका साथ
तो मैंने अपने को अंधेरे में पाया
और कष्टकर स्थितियां करने लगी अपमानित
होने लगा निराश्रित, पराजित
घिरने लगे विरोध और साजिशों के काले मेघ
अस्तित्व बन गया असहज, अस्वाभिक, संकटमय,
तब भी काले समय से संबंध जोड़ा नहीं..

                                                       23.03.12


जीवन की सीख
सीखा है मैंने प्रकृति से, जन-जन से
जीने के विविध संदर्भ
धरती की उष्मा पाकर उगते पेड़, पौधे,
कलियों की शुष्मा से भर जाता मन-उपवन

सीखा है नदी से, सागर से, लहरों के निश्छल, उच्छल,
कलकल, छल छल, करती ऊंचे नीचे गिरती उठती,
तट को समर्पित होती
अपना अस्तित्व अर्पित करती
सूखी सिक्ता का मन प्राण भिगोती
सीखा है पर्वत से साधना की मौन भाषा
सर्जित करते हवा, बादल, जल,
पूरी करते घाटियों की अभिलाषा
सीखा है, वन-प्रांतर से
नित नए रुपों में, हरियाली सर्जित करना
पशु,पक्षी, जीव जन्तुओं से
सीखा है मैंने उगते सूर्य की सतरंगी किरणों से
धरती की विविध रुपावली हरीतिमा से
सीखा है मैंने अस्तित्व-धर्म से
भीतर बैठे आत्मबोध-मर्म से  .....                                 
                                                           24.03.12


कालेधन की सुरंग में
कालेधन की अंधी सुरंग में
चाहे जितना चलते जाओ
वहां काले धन के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखता
वहां गहरा सन्नाटा होता
किन्तु वह भी काले धन की
काली चादर से ढंका रहता
जिससे फूटता विषैला रक्त अंग अंग में...

कितने सारे लोग,
देश भक्त, सेवक, जन-निर्वाचित प्रतिनिधि
अथवा छल बल कौशल से
सड़क से संसद, विधानसभाओं तक पहुंचे लोग
जो लगाने लगे पल पल
लोभ-लाभ का जन-भोग
चारो ओर उत्सव जैसा रंग छा गया
उड़ने लगी उनकी आकांक्षाएं
आत्मानन्द भरता
जैसे उन्मुक्त पंख खोले उड़ते विहंग में...

जन-रक्षक किस तरह बन जाता जन-भक्षक
आजादी का किस कदर झुक गया है मस्तक
किसी क्षितिज से प्रच्छन्न पराधीनता की
सुनाई दे रही देश-विरोधी दस्तक
काले धन के स्वामी स्वछन्द, अभिमानी
राजपथ से सिवान की टूटी फूटी सड़कों तक
बजा रहे अपने यश के मृदंग, ढोल, नगाड़े,
तरह तरह के छंद में
भला कौन जन-सेवक डाल सकता है विघ्न
सत्ता भोगी आनन्द में...

                                           26.03.12


प्रश्नों की गढरी लादे
मैं जन्म लेते ही सिर पर
प्रश्नों की गठरी लादे
समय की काली सड़क पर चल पड़ा
धरती की उष्मा, सौन्दर्य-छठा से
मन आनन्दित, प्रफूल्लित, आह्लादित हुआ
और जब जब जगाया सोनाली किरण भोर की
तब तब सुनाई पड़ने लगी आवाजें विषपायी
जन-अशांति, कोलाहल ओर छोर में हो रहे
विघटन और अंधकार की काली सड़क पर
चल रहा अनन्त-पथ पर
गन्तव्य की ओर दृष्टि साधे...
कभी कंधे पर, कभी सिर पर प्रश्नों की गठरी लादे...
अभी तक उन प्रश्नों में से एक का भी उत्तर नहीं मिला
जो अंधकार जन्म लेने के पूर्व छाया था
वही आज भी छाया है
प्रश्नों की भीड़ में केवल समय ने
आगे बढ़ने का सबक सिखाया
जो मेरी आस्था का संबल बना
मैने सदा विपरीत स्थितियों से उबरने के लिए
उसी समय का सहारा लिया
देखता रहा संसद से सड़क तक
आत्मलोभ, प्रपंच और सत्ताधारी लालषा का विचित्र खेल
आमजन और कुर्सी की राजनीति के चौसर-खेल में
जीतते रहे राजा, रानी, हाथी, घोड़े
और पिटते रहे गरीब, अक्षम पियादे
ऐसे में मैं बढ़ता रहा आश्वस्ति साधे
प्रश्नों की गठरी पीठ पर लादे...

अराजक-अंधकार से आम-जन को
कब और कैसे मिलेगी-मुक्ति और समग्र आजादी
कब होंगे पूरे पैंसठ वर्षों से बार-बार किए वादे
कब तक चलता रहूंगा प्रश्नों की गठरी लादे.....

                                                             27.03.12

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